शुक्रवार, 5 मार्च 2010

तिमिर हरणी - भाग 4

टिमरनी और टिमरनी के निवासियोँ की उन्नति मेँ यहाँ के राधास्वामी हाई स्कूल का अविस्मरणीय योगदान है । इस स्कूल की स्थापना सन 1929 मेँ हुई थी । इसके पहले यहाँ केवल एक प्राथमिक शाला ही थी जो शंकर मन्दिर के पास स्थित भवन मेँ लगती थी । आज भी यह स्कूल उसी प्राचीन भवन मेँ लगता है , यह बात अलग है कि अब इसका दर्जा मिडिल स्कूल का हो गया है और इसके परिसर मेँ कुछ नए कक्षोँ का निर्माण भी हो गया है । बाद मेँ एक कन्या प्राथमिक शाला भी खुल गई जो दत्त मन्दिर के पीछे एक पुराने भवन मेँ लगती थी । इस भवन का अब कोई अस्तित्व नहीँ बचा है । अब यहाँ केवल मैदान है जो आजकल महावीर ग्राउण्ड के नाम से जाना जाता है और अब यहाँ धार्मिक और सामाजिक आयोजन होते रहते हैँ । उस समय आगे की पढ़ाई के लिए केवल हर दृष्टि से सक्षम लोग ही अपने बच्चोँ को बाहर भेज सकते थे । इस प्रकार उच्च शासकीय शिक्षा की तत्कालीन व्यवस्था से टिमरनी के लोग लगभग वंचित ही रहते थे । ऐसे समय मेँ हंसकुमार नामक एक उच्च शिक्षित विद्वान आगरा से टिमरनी आए । वे जंगल के ठेकेदार थे , उन्होँने टिमरनी के पास के जंगलोँ का ठेका लिया हुआ था । अँग्रेज अधिकारियोँ के साथ उनके बहुत ही अच्छे सम्बंध थे । टिमरनी का वातावरण उन्हेँ कुछ ऐसा भाया कि वे यहीँ के होकर रह गए । यहाँ के प्रतिष्ठित लोगोँ के साथ उनका उठना - बैठना था । हंसकुमार दयालबाग आगरा के राधास्वामी सत्संग नामक सम्प्रदाय के अनुयायी थे । इस सम्प्रदाय के पाँचवे गुरु सर साहब जी महाराज थे जिन्हेँ आदर से सभी हुजूर साहब कहते थे । वे संभवत: हंसकुमार जी के बड़े भाई थे । हंसकुमार जी ने हुजूर साहब को टिमरनी आने का आग्रह किया । इस प्रकार हुजूर साहब का टिमरनी मेँ शुभ आगमन हुआ । टिमरनी के गण्यमान्य सज्जनोँ की एक बैठक हंसकुमार जी ने आयोजित की जिसमेँ हुजूर साहब भी उपस्थित हुए । इस बैठक मेँ टिमरनी मेँ शिक्षा की जरूरत पूरी करने के लिए हाई स्कूल खोलने की आवश्यकता पर चर्चा हुई । टिमरनी के तत्कालीन परम्परावादी लोगोँ ने यहाँ हाई स्कूल खोले जाने का पुरजोर विरोध किया । तब हुजूर साहब ने हंसकुमार जी से कहा कि जब यहाँ के लोग नहीँ चाहते तो आप क्योँ हाई स्कूल खोलने की ज़िद कर रहे हैँ । तब हंसकुमार जी ने कहा कि ये लोग शिक्षा के महत्व को समझ नहीँ पा रहे हैँ और इसीलिए यहाँ हाई स्कूल शुरु किए जाने की जरूरत है । हंसकुमार जी के अकाट्य तर्कोँ से सहमत होते हुए हुजूर साहब ने अन्त मेँ हाई स्कूल प्रारंभ करने की अनुमति दे दी । इस प्रकार 1929 मेँ टिमरनी मेँ राधास्वामी हाई स्कूल की स्थापना हुई । समय गवाह है कि हंसकुमार जी की सोच कितनी दूरगामी थी । आज इस स्कूल से पढ़कर निकले विद्यार्थियोँ ने देश के विभिन्न क्षेत्रोँ मेँ प्रतिष्ठित पदोँ पर कार्य करते हुए राष्ट्र और समाज की अभूतपूर्व सेवा की है । प्रारंभ मेँ इस स्कूल की कक्षाएँ रेल्वे फाटक के पास स्थित राजा बरारी एस्टेट के तत्कालीन टीन शेडोँ मेँ लगा करती थीँ । अब इस स्कूल को एक विशाल परिसर और भवन की दरकार थी । हंसकुमार जी ने अपनी ऊँची पहुँच और वाकपटुता से स्कूल के लिए रेल्वे स्टेशन और बस्ती के बीच स्थित एक खेत हासिल किया जहाँ 1932 मेँ राधास्वामी हाई स्कूल की बहुत ही ख़ूबसूरत और बेजोड़ इमारत तामीर हुई । ऐसा कहते हैँ कि इस नायाब भवन का मानचित्र स्वयं हंसकुमार जी ने तैयार किया था । इस इमारत का निर्माण हंसकुमार जी ने स्वयं अपनी देखरेख मेँ करवाया था । इसकी एक - एक ईँट पर हंसकुमार जी का संक्षिप्त नाम H K अंकित है । यूँ तो हंसकुमार जी ने समाज की भलाई के अनेक कार्य टिमरनी मेँ किए हैँ लेकिन राधास्वामी हाई स्कूल की स्थापना करके उन्होँने जो महान कार्य किया है उसके लिए उन्हेँ हमेशा याद रखा जायेगा । टिमरनी के लोग उनके इस उपकार के लिए सदैव ऋणी रहेँगे । टिमरनी के पुराने लोग आज भी हंसकुमार जी को भावुक होकर याद करते हैँ । कहते हैँ कि तब टिमरनी मेँ अँग्रेजी बोलने और समझने वाले केवल दो ही लोग थे एक हंसकुमार जी और दूसरे श्री जगन्नाथराव जी मुजुमदार । तब यदि किसी के यहाँ तार ( टेलीग्राम ) आता था तो इसका यही अर्थ होता था कि किसी की मौत हो गई है । तार मिलते ही घर मेँ कोहराम मच जाता था । तब अँग्रेजी मेँ लिखे हुए उस तार को पढ़वाने के लिए इन्हीँ दो सज्जनोँ के पास जाना पड़ता था । कई बार तार मेँ किसी खुशी की ख़बर भी होती थी लेकिन जब तक उसे इनसे पढ़वाया जाता था तब तक घर मेँ मातम का ही माहौल रहता था । एक समय था जबकि टिमरनी मेँ किसी के पास सायकल भी नहीँ थी ऐसे समय मेँ हंसकुमार जी के पास मोटरकार हुआ करती थी । चूँकि हंसकुमार जी का जंगलोँ के ठेके का काम था और इस कारण उन्हेँ राजा बरारी के जंगलोँ मेँ बार - बार जाना - आना पड़ता था इस कारण वे मोटरकार रखते थे । बच्चे उनकी मोटरकार को देखने के लिए दौड़ा करते थे । उस जमाने मेँ हंसकुमार जी ने टिमरनी से राजाबरारी के जंगल तक टेलीफोन की लाइन अपने स्वयं के खर्चे से डलवाई थी जिसके तारोँ के लिए लकड़ी की बल्लियाँ खड़ी की गई थीँ । आज कम्प्यूटर और मोबाइल फोन के युग मेँ ये बातेँ अविश्वसनीय भले ही लगेँ मगर हक़ीकत तो यही है । कहते हैँ कि उस जमाने मेँ टिमरनी के हर छोटे - बड़े काम मेँ केन्द्रीय भूमिका हंसकुमार जी की ही होती थी । टिमरनी की नदी के पुल का निर्माण भी हंसकुमार जी की ही देन है जिसे राधाबाई का पुल कहते हैँ । इस पुल के निर्माण से नदी की बाढ़ का पानी गाँव मेँ घुसना बन्द हो गया वरना पहले सारा गाँव जलमग्न हो जाया करता था और हर साल लोगोँ को बड़ी परेशानी और नुकसान उठाना पड़ता था ।

2 टिप्‍पणियां:

yellow ने कहा…

मुझे ना टिमरनी के बारे में कुछ पता है ना हंसकुमार जी के बारे में पता था, लेकिन आपका लेख पढ़कर मालूम हुआ कि दुनिया में ऐसे-ऐसे लोग भी हुआ करते थे। हंसकुमार जी का घर भी बड़ा आलीशान रहा होगा। मौका लगे तो उसे भी डालियेगा ब्लॉग पर।

Ashish Sakalle ने कहा…

bahut achcha hai ..
sadhuwad..