शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

टिमरनी अर्थात तिमिर हरणी

' टिमरनी ' , मध्य प्रदेश का ग्रामीण परम्पराओँ और शहरी मानसिकता वाला एक छोटा सा नगर । आबादी लगभग बीस हजार । देश के हजारोँ ऐसे ही नगरोँ से कई मामलोँ मेँ अलग और अनूठा है टिमरनी नगर । इस ब्लॉग मेँ टिमरनी के भूत , वर्तमान और सम्भव हुआ तो भविष्य की भी चर्चा होगी । इसके ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व , इसकी परम्परा , संस्कृति , विरासत और राजनीति को भी समझने की कोशिश की जाएगी । इसके चाल , चरित्र और चेहरे को पढ़ने का प्रयास भी होगा । यहाँ की किँवदन्तियोँ , हस्तियोँ और प्रमुख घटनाओँ का उल्लेख भी यहाँ क्रमश: करने का प्रयत्न होगा । इसके अलावा टिमरनी के बारे मेँ जो कुछ भी लिखने योग्य होगा वो सब आपको यहाँ पढ़ने को मिल सकता है । इस बारे मेँ आपके बहुमूल्य सुझावोँ का हमेशा स्वागत होगा । बस आप इसे पढ़ते रहिये । मुझे विश्वास है कि टिमरनी के बारे मेँ रुचि रखने वाले लोग जरूर इस उपक्रम को पसंद करेँगे ।
तो आइये ! आरम्भ करते हैँ इस नगर के नाम से । टिमरनी के बारे मेँ कहा जाता है कि यह देववाणी संस्कृत के शब्द ' तिमिर ' और ' हरणी ' को मिलाकर बने ' तिमिरहरणी ' शब्द का ही तद्भव रूप है जिसका अर्थ होता है अंधकार को हरने वाला । ' टिमरनी ' नाम के बारे मेँ प्रचलित मान्यताओँ मेँ यही सर्वाधिक उचित भी जान पड़ती है क्योँकि प्राचीनकाल मेँ अनेक उद्भट और मूर्धन्य विद्वान यहाँ निवास किया करते थे जो ज्ञान मेँ काशी के पण्डितोँ से भी शास्त्रार्थ करने की योग्यता रखते थे । यही कारण था कि टिमरनी को ' छोटी काशी ' की संज्ञा से भी विभूषित किया जाता था । टिमरनी के ये सभी विद्वान अपने धर्म , कर्म और वाणी से यहाँ के लोगोँ मेँ व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने का श्रेष्ठ कार्य किया करते थे । उनके इन्हीँ कार्योँ के फलस्वरूप इस स्थान को ' तिमिर हरणी ' कहा जाने लगा जो बाद मेँ ' टिमरनी ' हो गया । ऐसा कहते हैँ कि एक बार पड़ोस के निमाड़ क्षेत्र के किसी गाँव मेँ यज्ञ का आयोजन हुआ । पण्डितोँ की स्वाभाविक ईर्ष्या के चलते उस यज्ञ मेँ टिमरनी के किसी भी पण्डित को न तो आमंत्रित किया गया और न ही यज्ञ के सम्बन्ध मेँ उनसे कोई सलाह ली गई । लेकिन सहज श्रद्धा के कारण यहाँ के कुछ पण्डित उस यज्ञ मेँ दर्शनार्थ पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्हेँ यह अनुभव हुआ कि यज्ञ स्थल का चयन करने मेँ कुछ भूल हुई है । किसी अनिष्ट या अनहोनी को टालने के लिए उन्होँने आयोजकोँ से पूछा कि क्या यज्ञ के पूर्व यज्ञस्थल का भूमिशोधन किया गया था ? उन्हेँ उत्तर मिला कि इसकी क्या आवश्यकता है ? तब टिमरनी के पण्डितोँ ने कहा कि यदि यज्ञभूमि अशुद्ध हुई तो यज्ञ का अभीष्ट सिद्ध नहीँ हो पाएगा । जब कुछ लोगोँ को इन पण्डितोँ की बात ठीक लगी तो यज्ञस्थल की खुदाई की गई । उस समय वहाँ उपस्थित लोगोँ के आश्चर्य का ठिकाना नहीँ रहा जब वहाँ खुदाई मेँ ऊँट की हड्डियोँ का एक ढाँचा निकला । तब सभी लोग इन पण्डितोँ की विद्वता का लोहा मान गये ।
एक दूसरी घटना इस प्रकार बताई जाती है कि यहाँ के एक विद्वान पण्डित से किसी ने पूछा कि आज कौन सी तिथि है ? उस दिन अमावस्या थी लेकिन भूलवश उनके मुँह से निकल गया कि आज पूर्णिमा है । इस पर पूछने वाले ने उनकी विद्वता की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि आप कैसे पण्डित हो ? आज तो अमावस्या है और आप पूर्णिमा बता रहे हो । पण्डितजी को अपनी भूल का अहसास तो हो गया लेकिन तीर तरकश से निकल चुका था । उस व्यक्ति ने इस बात को लेकर नगर मेँ पण्डितजी की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए दुष्प्रचार कर दिया । पण्डितजी इससे बहुत आहत हुए । अन्तत: उन्होँने यह घोषणा कर दी कि जब उनके मुँह से निकला है कि आज पूर्णिमा है तो फिर आज सभी को पूर्णिमा के चाँद के दर्शन अवश्य ही होँगे । इसके बाद सायंकाल पण्डितजी ने एक काँसे की चमचमाती हुई बड़ी सी थाली मेँ चन्दन से कोई सिद्ध मंत्र लिखा और उस थाली को आकाश मेँ पूर्व दिशा की ओर जोर से उछाल दिया । थाली घनघनाती हुई आकाश की ओर चली गई । उस शाम टिमरनी के लोगोँ ने आकाश मेँ अद्भुत दृश्य देखा । अमावस्या होने के बाद भी आकाश पूर्णिमा के चाँद से आलोकित हो रहा था , टिमरनी का हर आँगन और गली - कूचा स्वच्छ , निर्मल और दूधिया चाँदनी मेँ नहा रहा था । एक पण्डित ने अपने मुँह से भूलवश निकले वचनोँ को सत्य सिद्ध करते हुए अमावस्या के तिमिर का हरण कर लिया था इसीलिए इस नगर को ' तिमिर - हरणी ' कहा गया ।
टिमरनी के नाम को लेकर एक अन्य धारणा यह भी है टिमरनी के निकट के जंगलोँ मेँ उच्चकोटि की सागौन की इमारती लकड़ी बहुतायत से पाई जाती है । ' टिम्बर ' अर्थात लकड़ी और ' नियर ' अर्थात पास मेँ । इस प्रकार अँग्रेजोँ के द्वारा ' टिम्बर - नियर ' कहने के कारण कालान्तर मेँ इस नगर को टिम्बरनियर के उच्चारण की सुविधा के कारण स्थानीय लोग टिमरनी कहने लगे । लेकिन यह धारणा अँग्रेजी काल से जुड़ी होने के कारण कुछ अर्वाचीन लगती है जबकि इस नगर का अस्तित्व अँग्रेजी काल से बहुत पुराना है । इस कारण टिमरनी के नाम को लेकर तिमिर हरणी वाली धारणा अधिक उपयुक्त और तर्कसंगत मालूम होती है । टिमरनी की मिट्टी , हवा और पानी मेँ ही कुछ ऐसी विशेषता है कि यहाँ के लोगोँ का ' आई क्यू ' इसी स्तर के अन्य नगरोँ के लोगोँ की तुलना मेँ अधिक होता है । शायद यह टिमरनी के उन्हीँ प्राचीन पण्डितोँ की तपस्या का ही सुफल है जिनके तपोबल से यहाँ का वायुमण्डल अब तक प्रभावी जान पड़ता है ।

..... क्रमश:

1 टिप्पणी:

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

नये वर्ष की शुभकामनाओं सहित

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डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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