शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

ज़माने लगेँगे

वतन की जो हालत
बताने लगेँगे ।
तो पत्थर भी आँसू
बहाने लगेँगे ।
कहीँ भीड़ मेँ
खो गई आदमीयत ,
उसे ढूँढने मेँ
ज़माने लगेँगे ।
अंधोँ के कंधोँ पे
बैठेँगे लँगड़े ,
किसी दिन तो चलकर
ठिकाने लगेँगे ।
अग़र हमने पहचानी
वोटोँ की क़ीमत ,
सभी अपने वादे
निभाने लगेँगे ।
ग़ज़ल मेँ अग़र जान
डाली है तूने ,
सभी लोग फिर
गुनगुनाने लगेँगे ।
[ यह ग़ज़ल मैँने कोई 30 साल पहले कही थी तब मैँ ग्वालियर मेँ था । कुछ गोष्ठियोँ मेँ मैँने इसे पढ़ा भी था । लगभग डेढ़ या दो वर्ष पहले दूरदर्शन पर एक गोष्ठी मेँ एक कवि ( नाम याद नहीँ आ रहा ) ने इस ग़ज़ल का मतला और पहला शेर बड़ी शान से सुना दिया । इस गोष्ठी का संचालन श्री सुरेश ' नीरव ' ( कादम्बिनी ) कर रहे थे । मैँ एक छोटे गाँव मेँ रहता हूँ और तब मेरे पास अपनी बात कहने के लिए यह साधन नहीँ था । मैँ अपनी रचना की चोरी का आरोप उन कवि महोदय पर लगाकर किसी विवाद को जन्म देना नहीँ चाहता पर अपनी बात कहने का मुझे पूरा हक़ है । उनका ईमान उन्हेँ मुबारक़ । हो सकता है कि यह महज़ एक इत्तिफ़ाक़ हो । उनके और मेरे भाव एवं शब्द मेल खा गए होँ । ख़ैर , बाक़ी सब मैँ आप जैसे सुधीजनोँ पर छोड़ता हूँ । मुझे उनसे कोई शिक़ायत नहीँ । ]

4 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

ग़ज़ल मेँ अग़र जान
डाली है तूने ,
सभी लोग फिर
गुनगुनाने लगेँगे ।

Bahut sundar, hamne bhee gungunaai !

vinay ने कहा…

कहीं भीड़ में खो गई आदमियत
ढूढने जमाने लगेगें
जीवन की,यथार्था कहती,हुई सुन्दर गज़ल ।

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

वतन की जो हालत
बताने लगेँगे ।
तो पत्थर भी आँसू
बहाने लगेँगे ।
sahi kaha aapne...

mere blog par dekhein..
फिर रंग दे बसंती...
http://ambarishambuj.blogspot.com/

ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…

WAH KYA BAAT H.
BHEED MEIN KHO GAYI AADMIYAT ...
BAHUT KHOOB LIKHA JANAB.
BAS AAPNI LIST MEIN KAHI JAGAH HO TO RAKH LENA AUR APNI RACHNAO SE HAMARI PYAS BUJHATE RAHNA.