सोमवार, 7 सितंबर 2009

पत्थर नहीँ हूँ मैँ

ज़र्रा हूँ कोई क़ीमती पत्थर नहीँ हूँ मैँ ।
कुछ भी हूँ मग़र तेरे बराबर नहीँ हूँ मैँ ।
मुफ़लिस हूँ मुक़द्दर का सिक़न्दर नहीँ हूँ मैँ ।
वाक़ई किसी फ़कीर से क़मतर नहीँ हूँ मैँ ।
मैली बहुत है ज़िन्दग़ी गहरे लगे हैँ दाग़ ,
ओढ़ी हुई क़बीर चादर नहीँ हूँ मैँ ।
गिर जाऊँगा मुझको न फ़लक़ पर बिठाओ तुम ,
नाचीज़ हूँ पहुँचा हुआ शायर नहीँ हूँ मैँ ।
जो भी जरूरी बात है बस आज ही कर लो ,
दिन बीतने के बाद मयस्सर नहीँ हूँ मैँ ।
आओ जरा क़रीब ग़िरेबाँ मेँ झाँक लो ,
सीने मेँ दिल है मोम का पत्थर नहीँ हूँ मैँ ।

4 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

वाह बहुत ही सुन्दर ......भाव और शब्द कमाल कर रहे है!

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

वाह जी, क्या बात है!!
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BlueBird

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आओ जरा क़रीब ग़िरेबाँ मेँ झाँक लो ,
सीने मेँ दिल है मोम का पत्थर नहीँ हूँ मैँ

रमेश जी बहुत खूब...वाह...अच्छा लिखा है...
नीरज

kulwant happy ने कहा…

एक शानदार कविता के लिए आपका आभारी हूं